Last night, I found it very hard to fall asleep as this poem for Gandhiji kept coming into my head. I promised that I will write it today. I did write it but I have missed the words that I have now forgotten. Here it is:
बापू मेरे बापू!
यह कैसा जन्म दिया रे! बापू!
रोज तेरी हरिजन बेटियों की
बलात्कार की चीखें
मेरे बंद दरवाजे खटखटाती हैं
फिर मेरी खिड़कियों से कूद कर
मेरे मन में बेशर्म बेहया
दर्द में वें चिल्लाती हैं|
बार बार अंधे हो कर
हम अब पश्चिम को पूजते हैं|
जंगलों को नोच नोच कर
धरती माँ को काट काट कर
अपनी आमदनी बढ़ाना
आज बापू प्रगती कहलाती हैं|
फिर रोज के यह हिंदू मुसलमान के झगड़े
भूके पेटों को बहुत सताते हैं|
कितने ही बड़े हिंदू हुए हैं|
कितने ही बड़े मुसलमान हुए हैं|
मेरी भारत माँ के लेकिन
बलात्कारी तो दोनो ही हैं!
यह कहाँ छोड़ दिया रे बापू!
रे बापू! मैं कैसे बताऊँ तुम्हे कि
तेरी याद मुझे कितनी सताती हैं!
बापू मेरे बापू!
यह कैसा जन्म दिया रे! बापू!
रोज तेरी हरिजन बेटियों की
बलात्कार की चीखें
मेरे बंद दरवाजे खटखटाती हैं
फिर मेरी खिड़कियों से कूद कर
मेरे मन में बेशर्म बेहया
दर्द में वें चिल्लाती हैं|
बार बार अंधे हो कर
हम अब पश्चिम को पूजते हैं|
जंगलों को नोच नोच कर
धरती माँ को काट काट कर
अपनी आमदनी बढ़ाना
आज बापू प्रगती कहलाती हैं|
फिर रोज के यह हिंदू मुसलमान के झगड़े
भूके पेटों को बहुत सताते हैं|
कितने ही बड़े हिंदू हुए हैं|
कितने ही बड़े मुसलमान हुए हैं|
मेरी भारत माँ के लेकिन
बलात्कारी तो दोनो ही हैं!
यह कहाँ छोड़ दिया रे बापू!
रे बापू! मैं कैसे बताऊँ तुम्हे कि
तेरी याद मुझे कितनी सताती हैं!
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